धरती का नमक

तुम पृथ्वी के नमक हो किन्तु यदि नमक नमकीन न रहे तो उसके खारेपन को दोबारा कैसे लौटाया जा सकेगा? तब तो वह किसी भी उपयोग का नहीं सिवाय इसके कि उसे बाहर फेंक दिया जाए और लोग उसे रौंदते हुए निकल जाएँ.


एक बार यीशु ने अपने चेलों की तरफ देखा और उनसे कहा, “तुम धरती के नमक हो”। यह मत्ती द्वारे लिखित सुसमाचार 5:13 में मिलता है और यह एक बहुत ही दिलचस्प बात है। आज, जब हम नमक के बारे में सोचते हैं, तो सबसे पहला स्रोत हमारे दिमाग में समुद्र आता है। समुद्र का पानी इकट्ठा किया जाता है और सूरज की गर्मी से या उबालकर भाप बनने दी जाती है | पानी के उड़ जाने के बाद वहां नमक और दूसरे खनिज पदार्थ  बच जाती है और इस नमक को अलग करके उसका इस्तेमाल हर जगह किया जाता है |  दूसरा स्रोत है नमक की खान। इसका एक उदाहरण पिंक सॉल्ट या लाहोरी नमक है।  इस्राएल में एक ख़ास नमक की खान पाई जाती है । हाँ, वे भी समुद्र के पानी से मिला नमक इस्तेमाल कर सकते है, लेकिन पास में एक आसान स्रोत है। 


मज़ेदार बात: लाहोरी नमक को अंग्रेजी में हिमालयन साल्ट बुलाई जाती है जबकि इसका हिमालय से कोई सम्बंद ही नहीं है |

इज़राइल की भूमिशास्त्र डेड सी के ठीक दक्षिण में एक जगह दिखाती है जो लगभग शुद्ध नमक का स्रोत है। यह माउंट सोडोम रेंज है। एक कुदरती नमक भंडार | इस नमक को पाने के लिए सिर्फ जमीन को खुरचने की ज़रुरत है | शायद इन्ही वजह से प्रेरित यीशु ने कहा, “धरती का नमक”।


इस तरह से बचाए गए नमक के टुकड़ों के कई इस्तेमाल में से एक है जानवरों के खाने के लिए। इज़राइल एक सूखा इलाका है और अच्छी सेहत बनाए रखने के लिए पानी पीना ज़रूरी है। यह बात यहाँ इंसान और जानवरों दोनों के लिए सच है। इंसानों को काफ़ी पानी पीने के लिए कहा जा सकता है और ऐसा करने की ज़रूरत सिखाई जा सकती है, लेकिन जानवरों को नहीं। तो लोग अपने जानवरों के लिए क्या करते थे? वे इस नमक के टुकड़े को जानवरों की जगह पर रख देते थे और जानवर अपने आप नमक चाट लेते थे। बदले में, इससे जानवरों की सेहत अच्छी होती थी, चारे की खपत बेहतर होती थी और पानी की बहुत ज़्यादा प्यास लगती थी। इसलिए जानवरों से नमक चटाना, पालने का एक आम हिस्सा था और आज भी है, खासकर इसलिए ताकि जानवर खुद को हाइड्रेट रख सके और उस इलाके के सूखे हालात में ज़िंदा रह सके |


यीशु अपने चेलों को धरती का नमक कहते हैं। क्यों? क्योंकि उन्हें ठीक वही करने के लिए बुलाया गया है जो यह नमक की डली करती है। उन्हें इस दुनिया में मसीह के अनुयायी के तौर पर जीने के लिए बुलाया गया है, जिन्हें परमेश्वर इस दुनिया के सामने मशाल के समान रखते हैं। मशाल की रौशनी लोगों को अंधेरे से निकालकर अपनी ओर खींचती है और हमारी ज़िंदगी भी ऐसी ही होनी चाहिए। अब जब इस दुनिया के लोग परमेश्वर के संतान की ज़िंदगी की ओर खिंचे चले आते हैं, तो उनमें एक गहरी चाहत, एक ऐसी चाहत पैदा होनी चाहिए जिसे समझाया न जा सके, जो सिर्फ उन लोगों में पाई जाती है जिन्हें 'क्रिस्टियन्स' कहा जाता है। यह किसी ऐसी चीज़ की प्यास है जिसे किसी वस्तु से बुझाई नहीं जा सकती, एक ऐसी विषय जो एक पार्थिव मनुष्य के समझ के परे ही रहती हो ।  शांति और खुशी जो किसी इंसान के हालात से जुड़ी न हो, भरोसा और उम्मीद जो हालात पर आधारित न हो। उद्धार की अवर्णित प्यास। हमें जब यीशु ने अपने पास बुलाया तो उन्होंने हमें इस दुनिया को बचाकर रखने के लिए, या इसका स्वाद बढ़ाने के लिए नहीं बुलाया | उन्होंने हमें इस दुनिया के सामने नमक की डली बनने के लिए बुलाया है, अंधेरे में भटकनेवाले लोगों का ध्यान मुक्ति की रोशनी की ओर खींचने के लिए बुलाया है |


अब नमक अपने आप में अंतिम मकसद नहीं है, बल्कि उसके ठीक पास मिलने वाला पानी ही वो अंतिम मकसद है। जबकि नमक प्यास पैदा करता है, यह सिर्फ़ अपने पास मिलने वाले ताज़े , ठंडे पानी से ही शांत होती है। शिष्य का काम बचाना नहीं है, बल्कि अपनी ज़िंदगी और बातों से मुक्ति का मार्ग दिखाना है, ताकि शिष्य जिन लोगों को छूता है, उनकी ज़िंदगी में इस मुक्ति के प्रति गहरी प्यास पैदा हो। यह प्यास शिष्य के ठीक बगल में मौजूद, यीशु मसीह, जीवित परमेश्वर के पुत्र में ही तृप्त की जा सकती है और आखिरकार बुझ सकती है। यीशु ही वो जीवन का पानी है जो इंसान के दिल की इस प्यास को बुझा सकता है। यीशु ही वो जीवन का जल है जो हमेशा के लिए, भरपूर जीवन दे सकता है। हमारा काम बस इस दुनिया को मसीह की ज़रूरत दिखाना है, जैसे नमक की डली पानी की करती है।


अब इस तरह के नमक के साथ समस्या यह है कि अगर यह कभी किसी भी तरह में पानी के संपर्क में आता है तो यह बस घुल जाता है और पीछे खनिज पदार्थ का बचा हुआ हिस्सा छोड़ जाता है  जिसकी कोई बराबर मकसद या कीमत नहीं होती। नमक का टुकड़ा जो अपना खारापन खो दिया है। यही वह बात है जिसके बारे में मसीह ने तुरंत बाद चेतावनी दी थी। अगर नमक अपना खारापन खो देता है, तो वह पैरों तले कुचले जाने के अलावा किसी काम का नहीं रह जाता। इन टुकड़ों के साथ ठीक यही होता है जब वे अपना खारापन खो देते हैं। आखिर में इसे रौंद देते हैं और मिट्टी में मिला देते हैं | उस नमक की डली का कोई निशान नहीं रह जाता। वे किसी काम के नहीं होते।


जब हम, यीशु के चेले, अपनी ज़िंदगी से अपना नमकीनपन, या यीशु का स्वाद खो देते हैं; जब हममें यीशु का सा स्वभाव नहीं होता; तो जिन लोगों के हम संपर्क में आते हैं, उनमे यीशु और उनके उद्धार के निमंत्रण के प्रति एक जिज्ञासा, एक चाहत पैदा नहीं होती। हमारी ज़िंदगी दूसरों पर कोई 'क्रिस्टियन' असर नहीं छोड़ती। हम इस दुनिया को सच्ची रोशनी, स्वर्ग से उतरे परमेश्वर के मेमने की ओर इशारा करने में नाकाम रहते हैं। हम लोगों को यीशु की ओर इशारा करने में नाकाम रहते हैं। जब ऐसा होता है, तो हम किसी काम के नहीं रहते। हम इस दुनिया में, परमेश्वर के राज्य के राजदूत के तौर पर किसी काम के नहीं रहते। हम अपने स्वामी की नकल करने के अपने चेले के कर्तव्य में नाकाम रहते हैं। हम 'क्रिस्टियन' या और साफ़ तौर पर, 'छोटे क्राइस्ट' की अपने पहचान को खो देते हैं और हम परमेश्वर और इस दुनिया को उनके और उनके पुत्र की ओर खींचने के उनके मकसद के लिए किसी काम के नहीं रहते। तब क्या होता है? हम दुनिया से अलग नहीं दिखते और बस उस टुकड़े की तरह हो जाते हैं जिसे ज़मीन में रौंदा गया हो और मिट्टी में मिल गया हो। उन लोगों से अलग नहीं जो अंधेरे में चलते रहते हैं।


यह सबसे बड़ा खतरा है जिसका सामना एक विश्वासी अपनी जीवन यात्रा में कर सकता है। इस दुनिया के समान बन जाना। रोमियों को लिखी गयी पत्री हमें इस खतरे से सावधान करती है। असल में, पौलुस रोमियों  12:1 और 2 में इसके उलट विनती करते है। पौलुस यहाँ यह विनती करते है कि हम इस दुनिया के हिसाब से न चलें। छोटी छोटी बातों में दुनियां को हाँ कहना शायद सिर्फ एक छोटी बात लगे, लेकिन यह अंत में धीरे-धीरे आपको इस संसार के समान रूपांतरित कर जाती है। इस दुनिया को अपनी नमकीनता को धीरे-धीरे गायब करने की इजाज़त देना बंद करें। लेकिन कैसे?


पत्रुस हमारा ध्यान परमेश्वर के आदेश की ओर खींचते हैं |  परमेश्वर कहते है, " पवित्र बनो, क्योंकि मैं पवित्र हूँ"। हाँ। अपने नामकीनियत को बरक़रार रखने का सबसे उत्तम मार्ग यही है । पवित्रता। अलग रहना। हमें इस दुनिया से अलग रहने के लिए बुलाया गया है। दुनियादारी हमें छूने न दे। अपनी नज़रें स्वर्ग की चीज़ों पर टिकाए रखें। पर यह सब कैसे? यीशु को देखो जो पापी दुनिया में, पापी लोगों के बीच चले और फिर भी वह आखिर तक बेदाग पाए गए। क्या ऐसी ज़िंदगी मुमकिन है? हाँ और इसलिए पौलुस रोमियों 12 में साफ निर्देश देते हैं कि हमें अपने शरीर को एक जीवित बलिदान के रूप में पेश करना है जो पवित्र है और परमेश्वर के समक्ष ग्रहणयोग्य है। वह आगे कहते हैं कि हम अपने मन के नए होने से रूपांतरित हो जाए ताकि हम परमेश्वर की इच्छा को साबित कर सकें जो अच्छी, स्वीकारयोग्य और उत्तम है।


जब यीशु ने अपने चेलों को ‘धरती का नमक’ कहा, तो मैं समझता हूँ की उनका यही मतलब था। याद रखें, अगर हम ख्रीस्त के चेले हैं, तो आपको और मुझे धरती का नमक 'बनने' की ज़रूरत नहीं है। न ही हमें दुनिया की रोशनी 'बनने' की ज़रूरत है। नहीं। हम पहले से ही हैं, ठीक उसी पल जब हम दोबारा पैदा होते हैं, या नया जन्म प्राप्त करते है । यह ख्रीस्त ही हैं जो पवित्र आत्मा के ज़रिए हमें नमक और रोशनी ठहराते हैं। जैसे जानवर अपने आप नमक की डली की तरफ खिंचे चले आते हैं और एक कीड़ा रौशनी की तरफ खिंचा चला जाता है, वैसे ही परमेश्वर आपकी ज़िंदगी लोगों को अपनी ओर खींचने का एक ज़रिया बनाते हैं। अगर आप ख्रीस्त यीशु में विश्वास करते हैं, तो आपके पास नमक न ठहरना का कोई चयन नहीं है। आप पहले से ही धरती का नमक हैं।


अब जो सवाल बचा है वह बस यही है:

क्या मेरी ज़िंदगी मुझमें और मेरे ज़रिए यीशु का स्वाद प्रदर्शित करती रहती है या मैंने अपना नमकपन खो दिया है?


गीत: तुम जगत की ज्योति हो, तुम धरा के नमक भी हो


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